पटेवा के पुरावशेष

 

सुरेश कुमार साहू

शोध-छात्र (पीएच. डी.) प्राण्भाण् इण् संण् एवं पुरातत्व, अण्शाण् पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर,(..)-492010

 

 

सरांश

पटेवा में शिवलिंग एवं शैव परिवार से संबंधित प्रतिमाएॅं अधिक है। शिवलिंग में चार मुख और पाॅंच मुख सामान्यतः देखने को मिलता है, किन्तु जलहरि का वर्गाकार होना और उस पर शैव परिवार ;गणेश एवं पार्वतीद्ध तथा वाहन वृशभ का शिल्पांकन विशिश्ट है, जो कि इस तरह की कलाकृतियाॅ दुर्लभ है। साथ ही गणेश का द्विभुजी होना भी सामान्य गणेश प्रतिमाओं से भिन्न है और गणेश की प्रतिमा आसन मुद्रा में ही है।

 

 

प्रस्तावना

महानदी, सोंढ़ूर एवं पैरी पवित्र सरिताओं का संगम स्थल राजिम है। राजिम, जिसेछत्तीसगढ़ का प्र्रयागकहते है। ‘‘इसका प्र्राचीन नामकमल क्षेत्रएवंपद्मपुरथा।’’1 ‘‘अनुश्रुति से इसके पद्म क्षेेत्रांतगर्त पद्मावतीपुरी नाम से ज्ञान होता है।राजिम माहात्म्यनामक एक संस्कृत ग्रंथ में इसे पद्मक्षेत्र कहा गया है।’’2 ‘‘एक अन्य लोक विश्वास से विदित होता है कि सृष्टि के प्रारंभ में भगवान विष्णु नाभि-कमल की एक पंखुड़ी ;कुछ के अनुसार केसर कणद्ध पृथ्वी पर गिर पड़ी। इस कमल दल द्वारा आच्छादित भू-भाग कालान्तर में पद्मक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कुलेश्वर ;उत्पलेश्वर लिंग-राजिमद्ध को केन्द्र मानकर चम्पेश्वर, बावनेश्वर, फिंगेश्वर तथा पटेश्वर- इन पाॅंच शिवलिंगोें द्वारा आवृत्त भूमि-खण्ड पर्यन्त इसका विस्तार स्वीकार किया जाता है। छत्तीसगढ़ अंचल में इस पद्म क्षेत्र की प्र्रदक्षिणा का विशेष धार्मिक महत्व है। इसे राजिम की पंचकोशी यात्रा के नाम से संबोधित किया जाता है।’’3

 

पटेवा नामक ग्राम रायपुर जिला मुख्यालय के अभनपुर तहसील के पूर्व दिशा में महानदी के समीप अवस्थित है। राजिम से 5 कि0मी0 पहले है तथा रायपुर से लगभग 42 कि0मी0 (21°58’03’’ उत्तरी अक्षांश, 81°49’17’’ पूर्वी देशांतर) दूरी पर अवस्थित है।

 

‘‘पटेवा में शिवलिंग की बहुलता है। पटेवा के पटेश्वरनाथ मुख्य शिवलिंग है तथा अन्य शिवलिंग जो क्रमशः है- भूमकापाट शिवलिंग, हरदेवलाल शिवलिंग, भोलेनाथ शिवलिंग, शिवभोला शिवलिंग, सोलहमुखी जलधारा महादेव शिवलिंग, पंचमुखी महादेव शिवलिंग अन्यान्य स्थानों पर अवस्थित है।’’4

 

यहांॅ पर नवनिर्मित कंकाली मंदिर है। मंदिर के सामने दो शिवलिंग दिखाई पड़ती है एक समीप में और दूसरा दूर में। जो नजदीक का शिवलिंग है, जिसे सोलहमुखी जलधारा शिवलिंग कहते है, कि सुरक्षा व्यवस्था हेतु मंदिर बनाने के निमित्त जमीन की नींव खुदाई करते समय लगभग दो फीट की गहराई पर ईंट की दीवार दिखाई देने लगी। शिवलिंग के नीचे ईट तथा पत्थर के दीवार रहे है साथ ही दो शिवलिंग भी जमीन के उपर अवस्थित हैं। यह समानांतर दूरी पर है, इन्ही के समानांतर दूरी पर थोड़े उंचाई दिखाई पड़ती है तथा मंदिर के बाहरी दिवाल थोड़े दूर तक दिखाई देती है। इसी स्थान पर एक छोटा-सा चबूतरा है,जिस पर मंदिर स्थापत्य के अवशेष रखा गया है। मंदिर में आमलक के उपर में पाषाण से निर्मित कलश लगा होता है,

 

वह यहाॅं पर रखा गया है। वितान अलंकरण जिसमें पूर्ण विकसित पद्म का अंकन है, वह भी है। इसके साथ मंदिर का द्वार शाखा, और खण्डित प्रतिमा भी है। मंदिर के अवशेष में और प्रतिमा के कलाकृति के आधार पर यह मंदिर अवशेष और प्रतिमा सोमवंशी कालीन प्रतीत होता है। ग्रामीणों द्वारा एक शिवलिंग को इसी स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया गया है और एक विशाल पाषाण स्तंभ भी यही था, उसे भी हटा दिया गया है। ग्रामीणों के कहने पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि, यह शिवमंदिर पंचायतन शैली का शिवमंदिर रहा होगा।

 

 

ग्राम कुर्रा से नयापारा राजिम जाने के लिए सड़क मार्ग है, के मध्य पटेवा नामक ग्र्राम अवस्थित है। इस सड़क मार्ग के किनारे तालाब है। ‘‘7 मई 2010 में तालाब का गहरीकरण का कार्य प्रारंभ हुआ इस दौरान तालाब की खुदाई से निकले मिट्टी को गहरे स्थान में डाला गया। दूसरे दिन शिवनाथ नाम का व्यक्ति उस मिट्टी को समतल कर रहा था उसी समय बारी-बारी से मूर्तिया मिली, जिसे साफ करके वहीं समीप के मंदिर में रख दिया गया।’’5 इस मंदिर में प्रस्तर की प्रतिमा है, जिसे कंकाली कहते है। इसे सिंदूर से पुत दिया गया है तथा चांदी से आंखे और जीभ बना दिया गया है। यहीं पर शिवलिंग है। यह शिवलिंग सोमवंशी काल का प्रतीत होता है। शिवलिंग काले प्रस्तर से निर्मित है। शिवलिंग की माप 5 से.मी. है। शिवलिंग की जलहरि वर्गाकार में है। जिसका माप चारों तरफ से 9 से.मी. तथा उचाई भी 9 से.मी. है। तीन ओर से क्रमशः गणेश, नन्दी एवं पार्वती का अंकन देखने कोे मिलता है। तथा एक सादा है। तरफ  गणेश आसीन मुद्रा में है, सिर पर मुकुट होकर खुले बिखरे बाल द्रष्टव्य है। दो हाथ है तथा सूंड़ सामान्य अपने बांई ओर किये हुए है। उसके बाद नन्दी का शिल्पांकन है। नन्दी सिर उंचा किए हुए है तथा नन्दी का ककुद उन्नत दिखई पड़ती है। नन्दी घंटियों के हार पहने हुए है और पैर स्पस्ट रूप से है। तीसरे क्रम में पार्वती का केवल सिर भाग ही का अंकन है। पार्वती सिर में मुकुट धारण नहीं किए है, जबकि सिर के बाल बिखरे हुए हैै। इस तरह के शिवलिंग अभी तक इस अंचल में नहीं मिले हैं। अब तक के शिवलिंग मिले हैं उस शिवलिंग में मानव मुख का अंकन देखने को मिला हैं। लेकिन जलहरि के वर्गाकार और उस पर देवी-देवताओं का अंकन देखने को नहीं मिला है। कलाकार की कृति बहुत ही संुदर है। देवी-देवताओं एवं वाहन का अंकन होना यह दुर्लभ है। उमा-महेश्वर की प्रतिमा प्रस्तर पर निर्मित है, जिसका माप 10×8.5×1.25से.मी. है। ‘‘लिंग के अन्तगर्त शिव के एक मुख से लेकर पांॅच मुखों तक का चित्रण किया जाता था और लिंग के इस रूप को मुख लिंग की संज्ञा से अभिहित किया जाता था।’’6 विष्णु की प्रतिमा यह भी प्रस्तर से निर्मित है तथा प्रतिमा छोटी है, का माप 6×2.75×0.7से.मी. का है। काले पत्थर पर बना योध्दा की मूर्ति है, जिसका माप 12×7×3से.मी. है। योध्दा के बांये हाथ में तलवार तथा दाहिने हाथ में ढ़ाल पकड़े हुए है। तथा अधो वस्त्र धोती धारण किए हुए है।

 

 

पाषाण कला के साथ मृण्मय कला भी है, जिसमें कृष्ण के बालरूप का अंकन है, जो कि अपने पैर के अंगूठे चूंसते हुए है। इस प्रतिमा का माप 15×11×5से.मी. है एवं अन्य खण्डित छोटी-छोटी मूर्तियाॅ हैै।

 

 

मंदिर के सामने एक छोटा चबूतरा है। जिस पर मंदिर स्थापत्य खण्ड एवं खण्डित मूर्ति है। स्थापत्य खण्ड में पूर्ण विकसीत पद्म का अलंकरण है। पत्थर लाल, हल्के केसरिया रंग का हैं। यह सेामवंशी कालीन अनुमानित है।

 

 

बाजार चैक के समीप महामाया मंदिर है। प्रतिमा में गणेश की प्रतिमा प्रमुख है। गणेश की प्रतिमा द्विभुजी है। प्रतिमा का माप 10×6×3से.मी. है। सिंदूर पुत जाने के कारण इसके काल का पता नही लग पा रहा है। लेकिन यह सोमवंशी काल का प्रतीत होता हैै। यह आसन मुद्रा में आसनस्थ है। व्दिभुजी का बांया हाथ अभय मुद्रा में है तथा दांय हाथ मेें मोदक लिए हुए है। सूड़ उस मोदक के समीप हैं। गणेश के दांये पक्ष का केवल एक दन्त द्रष्टव्य है।

 

 

 

 

गांॅव के बीच बस्ती में हनुमान का मंदिर है। यहाॅं भी गणेश की प्रतिमा है। प्रतिमा काले प्रस्तर पर निर्मित है। प्रतिमा का माप 19×12×5से.मी. है। गणेश ललितासन मुद्रा मेें आसनस्थ हैैं। गणेश का सिर भाग खण्डित है, जिसमेें सूंड़ दिखाई नहीं पड़ता, केवल बांये तरफ के एक दांत दिखाई पड़ती है। व्दिभुजी गणेश बांय हाथ में मोदक तथा दांये हाथ में मूसर-सरीखा या दण्ड धारण किए हुए है। गले में हार एवं यज्ञोपवीत द्रष्टव्य है। गणेश की प्रतिमाओं में सामान्यतः चार हाथ होते है, लेकिन यहाॅं के सभी गणेश की प्रतिमाओं में केवल दो हाथ ही दिखाई देती है। दो खण्डित मूर्ति है, जिसका केवल सिर भाग ही है। मूर्ति लाल, हल्के केशरिया रंग के प्रस्तर से और काले प्रस्तार से निर्मित है। यह सोमवंशी कालीन अनुमानित हैै।

 

बाजार चैक से पश्चिम दिशा में अष्टभुजी दुर्गा की खण्डित प्रतिमा है। प्रतिमा का माप 60×39×14 से.मी. है। यह काले रंग के प्रस्तर पर निर्मित है। साथ में एक द्विभुजी सिर भंगिमा मूर्ति प्रतिमा है, जिसका पहचान नहीं हो पाया हैैैै। ग्रामीण जन अन्नपूर्णा देवी के नाम से जानते है। फसल कटने पर ग्रामीण फसल को देवी को अर्पित करते है।

 

गांॅव के बाहर खेत के समीप पाषाण स्तंभ है। यहाॅं की भूमि सामान्य तल से कुछ उचांई पर है और ईंट एवं मद्भाण्ड के अवशेष दिखाई पड़ते है।

 

संदर्भ

1.                          धरोहर, राज्य के संरक्षित स्मारक, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, रायपुर (..) पृ.1

2.                          ठाकुर, विष्णु सिंह, राजिम, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी,      भोपाल, 1972 पृ.-8

3.                          वही, पृ.-9

4.                          ग्र्रामीणों द्वारा हुई मौखिक चर्चा के अनुसार।

5.                          वही

6.                          श्रीवास्तव, डाॅ. बृजभूषण, प्राचीन भारतीय प्रतिमा-विज्ञान एवं    मूर्ति-कला, विश्वविद्यालय प्रकाशन चैक, वाराणसी, 2007 पृ.-60

 

Received on 19.01.2012

Revised on 05.02.2012

Accepted on 12.03.2012     

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Research J.  Humanities and Social Sciences. 3(2): April-June, 2012, 252-255